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शाहीन बाग का क्या रिश्ता अल्लामा इकबाल से

विवेक शुक्ला

अल्लामा इकबाल ने जब अपनी नज्म  ‘तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा, तिरे सामने आसमाँ और भी हैं...’ को अपने शहर लाहौर में 1935 लिखा होगा तो जाहिर है कि उन्होंने ये तो नहीं सोचा होगा उनकी इस नज्म से प्रेरित होकर आगे चलकर रामपुर में पैदा हुआ एक शख्स दिल्ली में एक कॉलोनी का नाम ही रख देगा। उसकी पहचान होगी शाहीन बाग से।

अल्लामा इकबाल (Allama Iqbal ) की शायरी में कई बार शाहीन (बाज़) शब्द आता है। वे एक तरह से जनता का आहवान करते हैं कि वे बाज की तरह उड़ने का ख्वाब देखें, जीवन में कुछ खास करके दिखाएं। उन्हें सफलता मिलेगी। गालिब एकाडमी के सचिव डॉ. अकील अहमद कहते हैं कि अल्लामा इकबाल ने शाहीन शब्द का इस्तेमाल अपनी कई नज्मों में नौजवानों का आहवान करते हुए किया है। वे इसका इस्तेमाल बिंब के रूप में करते हैं।

कब कब सुर्खियों में आया शाहीन बाग

शाहीन बाग को कायदे से पहचान तब मिली थी जब यहां पर 2019 में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) के खिलाफ औरतों का लंबा धरना चला था। कोरोना के कहर के कारण वह धरना खत्म हुआ तो लगा कि शाहीन बाग अब खबरों में नहीं रहेगा। पर ये उसकी किस्मत में लगता नहीं है। अब यहां दिल्ली नगर निगम (MCD) का बुलडोजर अतिक्रमण का मामला उभरा । मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के पूर्व चांसलर फिरोज बख्त अहमद(Firoz Bakht Ahmed) बताते हैं कि शारिक अनसारउल्ला नाम के एक शख्स ने 1980 के दशक में साउथ-ईस्ट दिल्ली के जसोला गांव की काफी जमीन खरीदी। उन्होंने वहां प्लाट काटे। उन्होंने उस कॉलोनी का नाम सरकारी दस्तावेजों में शाहीन बाग दर्ज करवा दिया। दरअसल शारिक अनसारउल्ला को अल्लामा इकबाल की शायरी ने बहुत प्रभावित किया था। इसलिए उन्होंने अपने प्रिय शायर के प्रति अपनी मोहब्बत का इजहार इस तरह से किया कि उन्होंने एक कॉलोनी का नाम ही शाहीन रख दिया।

और गुलजार हो गया शाहीन बाग

शाहीन बाग बनाने वाले अनसारउल्ला के करीबी बताते हैं कि वे 1980 में जामिया मिलिया इस्लामिया (Jamia Millia Islamia) में पढ़ने के लिए आए थे। तब जामिया मिलिया इस्लामिया के आसपास का इलाका लगभग खाली सा था। उस दौर में उन्होंने इस एरिया को खूब घूमा । जामिया मिलिया इस्लामिया से पढ़ाई पूरी करनेके बाद उन्होंने अपने पिता की मदद से जसोला में 75 बीघा जमीन खरीद ली। वहां पर एक कॉलोनी काटी। उसका नाम रखा शाहीन बाग। चूंकि दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों के बाद हजारों लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा बिहार से खासतौर पर दिल्ली शिफ्ट हुए तो उन्होंने शाहीन बाग में धीरे-धीरे प्लाट खरीद कर अपने आशियाने बनाने चालू कर दिए। जिनकी माली हालत प्लाट खरीदने की नहीं थी उन्होंने रेंट के घरों में रहना चालू कर दिया। इस तरह शाहीन बाग गुलजार हो गया। शाहीन बाग में टहलते हुए कई लोगों से बात की इसके नाम के इकबाल से संबंधों को लेकर। अधिकतर को यह जानकारी नहीं थी कि शाहीन बाग में इकबाल भी छिपे हैं। 

बहरहाल,शाहीन बाग में घर बनाने वालों में जामिया मिलिया इस्लामिया के बहुत से मुलाजिम भी थे/हैं। इसी तरह से शाहीन बाग में जामिया मिलिया इस्लामिया के अनेक मुलाजिम तथा स्टुडेंट्स रेंट पर रहते हैं। वजह साफ है। शाहीन बाग और जामिया मिलिया इस्लामिया करीब ही तो हैं।

गांधीजीऔरइकबालऔर ‘सारेजहांसे गांधी जी और इकबाल और ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा…’

इसी जामिया मिलिया इस्लामिया का पहला वाइस चांसलर बनने की पेशकश महात्मा गांधी ने अल्लमा इकबाल से 1920 में की थी। हालांकि उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया था। वैसे इकबाल 18 मार्च, 1931 को जामिया मिलिया इस्लामिया में एक सम्मेलन में शिरकत करने आए थे। उस समय जामिया जामिया मिलिया इस्लामिया करोल बाग में थी। अल्लमा इकबाल लगातार दिल्ली आते रहे। उनका हजरत निजामुद्दीन औलिया को लेकर गहरा अकीदा था। वे  दिल्ली आने पर हजरत निजामउदीन की दरगाह में अवश्य हाजिरी देने के लिए पहुंचते थे। इकबाल हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सारी-सारी रात भर बैठे रहते थे। वे 2 सितंबर,1905 को इंग्लैंड जाने से पहले पहली बार इधर आए थे। वे तब तक ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा…’ गीत लिख चुके थे।  उनका सूफी सिलसिले में गहरा यकीन था। वे तब ही चचा गालिब की मजार पर भी गए।

गालिब के शैदाई इकबाल

 इकबाल पर गालिब की शायरी   का खासा असर था। वे मानते थे कि गालिब की मजार पर आना शायरों के लिए हज करने के समान है। दिल्ली के बाद वे मुंबई के रास्ते इंग्लैंड गए। वे छह सालों के बाद अप्रैल, 1910 में फिर दिल्ली आते हैं। यहां पर उन्हें आल इंडिया मोहम्मडन एजुकेशनल कांफ्रेस में भाग लेना था। वे इस कांफ्रेंस की सदारत कर रहे थे। वे कुछ महीनों के बाद 8 सितंबर, 1910 को फिर दिल्ली में थे। इस बार उनकी दिल्ली यात्रा का मकसद हकीम अजमल खान से मिलना था। वे उनके पुरानी दिल्ली स्थित घर शरीफ मंजिल भी जाते हैं। हकीम साहब हिन्दुस्तानी दवाखाना के प्रमुख थे। चूंकि दिल्ली शुरू से ही राजनीतिक रूप से एक महत्वपूर्ण शहर था, इसलिए इकबाल का यहां पर आना-जाना लगा रहता था।

 बदले तेवर ‘सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान…’ लिखने वाले के

इकबाल 1910 में ही ‘तराना-ए-मिल्ली’ कविता लिखते हैं।  इसमें उनके तेवर बदलते हैं। वे बहुलतावादी भारत के विचार से दूर जाते दिखाई देते हैं। कहते हैं कि अपनी एक दिल्ली यात्रा के दौरान इकबाल हुमायूं के मकबरे पर भी पहुंचे।  खैर, वे दिल्ली में कई बार आए पर उस जगह के पास कभी नहीं गए जहां पर आगे चलकर शाहीन बाग को बनना था।

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